आओ चलें,
डूबते सूरज की आग से,
रात का लोहा पिघलाना है.
चाँद के पत्थर पे घिसना है,
एक हथियार बनाना है.
ये दरिया सो गया है,
खामोश है...
तूफ़ान जो आना है.
तुम्हारे और मेरे दरमियाँ,
जिस्मों के फासले क्यूँ है?
तुम कहते हो हम एक हैं,
फिर यूँ परे खड़े क्यूँ हैं?
हर रोज़ हमारी खाल पे,
एक रंग लगा देते हैं वो,
हर रोज़ एक नाम देते है,
और पहचान चुरा लेते हैं वो...
आज अब्र से अश्क कुछ यूँ बरसे,
कि धुल जाए जिस्म, तेरा भी- मेरा भी
न रह जाये कोई फासला
घुल जाये जिस्म, तेरा भी- मेरा भी...
क्या नाम है तुम्हारा
कुछ इल्म नहीं, कुछ याद नहीं...
कल ही तो तुम्हे देखा था,
कदम से कदम मिला कर साथ चलते हुए,
और आज कुछ 'अपनों' ने,
तुम्हे बाहर खड़ा छोड़ दिया है,
तनहा!
और अन्दर जश्न मनाने में,
कोई शर्म नहीं समझी.
हमने सोचा था, ये बराबरी कि जंग है,
हक़ की लड़ाई है...
मगर इस छोटे से घर में भी,
एक पूरी दुनिया पराई है,
वाह! कैसी बराबरी? क्या हक़?
कोई सुनवाई नहीं- फ़रियाद नहीं,
अंदर से सुलग रहा है लावा,
कुछ देर और सही,
शहर के शहर ढह जायेंगे...
... सैलाब वो आना है!
आओ चलें,
डूबते सूरज की आग से,
रात का लोहा पिघलाना है.
अंकुश गुप्ता
Wednesday, April 25, 2012
Friday, April 20, 2012
खोज
आज खोजते रहे हम,
सारा दिन, सारी रात...
तुम्हारे सीने की गर्माहट,
तुम्हारे कंधे, तुम्हारे हाथ.
पत्थर की एक गीली सड़क,
और उसके किनारे भीगते हुए,
मेरे माथे से पानी पोंछने के बहाने,
तुम्हारा मेरे गालों को सहलाना
दो प्याली चाय
तमाम उम्र के किस्से
बिन बात के बिगड़ना,
बात-बात पे बहलाना...
सारा दिन लेटे रहना...
यूँ ही, खामोश,
और फिर शिकायत करना,
'तुम कुछ कहते क्यूँ नहीं?'
यूँ ही लिपटे रहना,
और फिर उलझ जाना...
रात के चाँद से, सुबह के तारे तक,
कोई गुफ्तगू नहीं.
तुम्हारे बाज़ुओं से लिपट जाना
किसी तावीज़ की तरह
और बार-बार उन्हें चूम के,
तुम्हारे नाम का कलमा पढ़ना
तुम्हारे आगोश में बहते रहना
इस शहर के सैलाब में
तुम्हे छू के समझना,
ये सब सच है
तुम्हे थाम के, ख्वाब गढ़ना...
तुम्हारे जिस्म की हर तह, हर रेशा,
हर करवट, हर सिलवट
हर अंगड़ाई, हर मोड़
हर गोशा, हर हरकत,
हर ख़ामोशी, हर बात...
तुम्हारे सीने की गर्माहट,
तुम्हारे कंधे, तुम्हारे हाथ.
आज खोजते रहे हम,
सारा दिन, सारी रात.
सारा दिन, सारी रात...
तुम्हारे सीने की गर्माहट,
तुम्हारे कंधे, तुम्हारे हाथ.
पत्थर की एक गीली सड़क,
और उसके किनारे भीगते हुए,
मेरे माथे से पानी पोंछने के बहाने,
तुम्हारा मेरे गालों को सहलाना
दो प्याली चाय
तमाम उम्र के किस्से
बिन बात के बिगड़ना,
बात-बात पे बहलाना...
सारा दिन लेटे रहना...
यूँ ही, खामोश,
और फिर शिकायत करना,
'तुम कुछ कहते क्यूँ नहीं?'
यूँ ही लिपटे रहना,
और फिर उलझ जाना...
रात के चाँद से, सुबह के तारे तक,
कोई गुफ्तगू नहीं.
तुम्हारे बाज़ुओं से लिपट जाना
किसी तावीज़ की तरह
और बार-बार उन्हें चूम के,
तुम्हारे नाम का कलमा पढ़ना
तुम्हारे आगोश में बहते रहना
इस शहर के सैलाब में
तुम्हे छू के समझना,
ये सब सच है
तुम्हे थाम के, ख्वाब गढ़ना...
तुम्हारे जिस्म की हर तह, हर रेशा,
हर करवट, हर सिलवट
हर अंगड़ाई, हर मोड़
हर गोशा, हर हरकत,
हर ख़ामोशी, हर बात...
तुम्हारे सीने की गर्माहट,
तुम्हारे कंधे, तुम्हारे हाथ.
आज खोजते रहे हम,
सारा दिन, सारी रात.
Friday, March 2, 2012
जे. एन. यू.
एक रोज़,
पक्की सड़क पे चलते चलते, जब उकता सा गया
तो किसी अजनबी ने एक पगडण्डी दिखाई थी..
और कहा था...
कि यहाँ लोग अपने रास्ते खुद बनाते हैं.
ये वो वक़्त था,
जब सारी रात खाना मिलने पे पाबन्दी नहीं लगी थी...
क्यूंकि हम रात भर सोते ही नहीं थे.
जब वक़्त-बे-वक़्त आने वाले हमारे दोस्तों को,
सिक्यूरिटी वाले 'भैया' से जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती थी,
जब पी. एस. आर. पे लोहे का गेट नहीं लगा था...
जब दो पल की ख़ुशी के दाम नहीं देने पड़ते थे...
जब रात के दो बजे भी...
stadium की घास पे बैठकर,
हम गप्पें मार सकते थे.
शायद लोगों को याद नहीं होगा,
कभी ये जगह आजाद भी हुआ करती थी.
मगर आज आई कार्ड दिखाकर जब अन्दर जाता हूँ...
तो हर रास्ता अजनबी लगता है,
यूँ लगता है, जैसे न जाने किस लम्हे...
ये इमारतें, ये पत्थर, ये ढाबे
मुझे पहचानने से इनकार कर देंगे
और मेरे मैं होने का, सबूत मांगने लगेंगे.
उस दिन,
जब मैं एक कागज़ के टुकड़े से हार जाऊंगा,
तब क्या होगा?
पक्की सड़क पर भागते हुए मेरे कदम...
रुकते हैं किसी टी- पॉइंट पर जाकर,
एक घुप्प सन्नाटा महसूस होता है...
आखिरकार,
जे. एन. यू. सो जो रहा है.
पक्की सड़क पे चलते चलते, जब उकता सा गया
तो किसी अजनबी ने एक पगडण्डी दिखाई थी..
और कहा था...
कि यहाँ लोग अपने रास्ते खुद बनाते हैं.
ये वो वक़्त था,
जब सारी रात खाना मिलने पे पाबन्दी नहीं लगी थी...
क्यूंकि हम रात भर सोते ही नहीं थे.
जब वक़्त-बे-वक़्त आने वाले हमारे दोस्तों को,
सिक्यूरिटी वाले 'भैया' से जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती थी,
जब पी. एस. आर. पे लोहे का गेट नहीं लगा था...
जब दो पल की ख़ुशी के दाम नहीं देने पड़ते थे...
जब रात के दो बजे भी...
stadium की घास पे बैठकर,
हम गप्पें मार सकते थे.
शायद लोगों को याद नहीं होगा,
कभी ये जगह आजाद भी हुआ करती थी.
मगर आज आई कार्ड दिखाकर जब अन्दर जाता हूँ...
तो हर रास्ता अजनबी लगता है,
यूँ लगता है, जैसे न जाने किस लम्हे...
ये इमारतें, ये पत्थर, ये ढाबे
मुझे पहचानने से इनकार कर देंगे
और मेरे मैं होने का, सबूत मांगने लगेंगे.
उस दिन,
जब मैं एक कागज़ के टुकड़े से हार जाऊंगा,
तब क्या होगा?
पक्की सड़क पर भागते हुए मेरे कदम...
रुकते हैं किसी टी- पॉइंट पर जाकर,
एक घुप्प सन्नाटा महसूस होता है...
आखिरकार,
जे. एन. यू. सो जो रहा है.
Tuesday, January 31, 2012
याद
आज कल मेरे कमरे में कोई रहता है...
कभी औंधे पड़े जब आँख मेरी खुलती है
मैं उसे देखता हूँ सामने यूँ बैठे हुए
वो मेरे कांधे पे हर रोज़ अपने होठों से
बस कोई शोख़ इबारत सी लिखे जाती है...
और कभी रात भर मैं करवटें बदलता नहीं
यूँ मुझे लगता है वो पास कहीं सोती है
हैं उसके हाथ कहीं लिपटे मेरे सीने से
जैसे वो जिस्म मेरा रात भर सहलाती है...
मेरे हाथों से उसकी खुशबू भी जाती ही नहीं
रोज़ आ जाती है सफ़री, शरार-ए-सहरी सी
हरेक गोशे को मेरे जाने किस तवस्सुल से
नगहत-ए-गुल, नमूद-ए-शबनम तक महकाती है...
ये भी देखा है हमने बारहा बेखुद होके
जैसे कि ये विसाल बस कोई सुराब नहीं
आलम-ए-इज़्तराब, सेहरा-ए-मुहब्बत में
जब भी जाता हूँ उसकी याद चली आती है...
कभी औंधे पड़े जब आँख मेरी खुलती है
मैं उसे देखता हूँ सामने यूँ बैठे हुए
वो मेरे कांधे पे हर रोज़ अपने होठों से
बस कोई शोख़ इबारत सी लिखे जाती है...
और कभी रात भर मैं करवटें बदलता नहीं
यूँ मुझे लगता है वो पास कहीं सोती है
हैं उसके हाथ कहीं लिपटे मेरे सीने से
जैसे वो जिस्म मेरा रात भर सहलाती है...
मेरे हाथों से उसकी खुशबू भी जाती ही नहीं
रोज़ आ जाती है सफ़री, शरार-ए-सहरी सी
हरेक गोशे को मेरे जाने किस तवस्सुल से
नगहत-ए-गुल, नमूद-ए-शबनम तक महकाती है...
ये भी देखा है हमने बारहा बेखुद होके
जैसे कि ये विसाल बस कोई सुराब नहीं
आलम-ए-इज़्तराब, सेहरा-ए-मुहब्बत में
जब भी जाता हूँ उसकी याद चली आती है...
Thursday, January 19, 2012
untitled 2
नीली रोशनी में नहाये बदन,
क्या-क्या दास्तानें सुनाएं बदन.
महकी ख्वाहिशों का
एक लिबास है, उजास है;
जो उँगलियों के पोर से
फिसल-फिसल के पुतलियों
की सीप में बरस रही
हैं चूम कर,
मचल रहे दो लब कहीं.
है एड़ियों पे फिर रहा
वो रेशमी सी रात का
कोई सिरा, जो खुल गया
की बेखबर जो चाँद था
वो आसमान की नाव में
है डोलता मचल-मचल
बरस रहा पिघल-पिघल
वो खिड़कियों के रास्ते
यूँ तैरता है हर तरफ
कि हाथ बस बढ़ा सा लें
तो ओढ़ लें ये दो बदन...
ये दो बदन
जो एक हैं.
क्या-क्या दास्तानें सुनाएं बदन.
महकी ख्वाहिशों का
एक लिबास है, उजास है;
जो उँगलियों के पोर से
फिसल-फिसल के पुतलियों
की सीप में बरस रही
हैं चूम कर,
मचल रहे दो लब कहीं.
है एड़ियों पे फिर रहा
वो रेशमी सी रात का
कोई सिरा, जो खुल गया
की बेखबर जो चाँद था
वो आसमान की नाव में
है डोलता मचल-मचल
बरस रहा पिघल-पिघल
वो खिड़कियों के रास्ते
यूँ तैरता है हर तरफ
कि हाथ बस बढ़ा सा लें
तो ओढ़ लें ये दो बदन...
ये दो बदन
जो एक हैं.
Monday, November 7, 2011
khat
ना जाने मैं ये ख़त तुम्हे क्यूँ लिख रहा हूँ... ना जाने वो कौन सी बात है, जो मेरे लब तुम्हारे कानों में फुसफुसा नहीं सकते. मेरे रुंधे से गले में अटकी सी हुई एक चीख... शायद तुम्हारे शानों की सरमायेदारी की मोहताज है... ना जाने कब वो मौसम मेहेरबान होगा... ना जाने कब सावन जायेगा... ना जाने कब आँखों के आइने में तुम झांकोगे... ना जाने कब मैं फिर से खो जाऊंगा, ना जाने तुम कब मिलोगे? इस जुबां में तुम्हारी तंगहाली का इल्म होते हए भी, तुम्हे इसीमें ख़त लिख रहा हूँ... इस जुर्म की जो भी सजा मुनासिब लगे, दे देना.
आज ना जाने क्यूँ, पुरानी दिल्ली के गुम्बद आँखों के सामने तैर रहे हैं... एक प्याली फिरनी की तड़प साल रही है, गुनगुनी धुप में लिपटी एक अलसाई दोपहर मेरे बदन पे रेंग रही है... डर लगता है, ना जाने किस लम्हा ये डंक मार देगी... ये ख़लिश भी जान्गुसिल है. खयालों का एक सिलसिला सा चल रहा है... यादों के कितने बंजारे आज यहाँ डेरा जमाने वाले हैं: किस्सागोई होगी, सारा दिन नज्मों की खुशबू से महकेगा, जाम टकरायेंगे, शेर पढ़े जायेंगे... और कल सुबह, जब इन तम्बुओं के सिरे खुलेंगे, और ये सब एक नए मुकाम की तलाश में निकल पड़ेंगे, तब मैं यहीं खड़ा रह जाऊंगा- तनहा!
आज ना जाने क्यूँ, पुरानी दिल्ली के गुम्बद आँखों के सामने तैर रहे हैं... एक प्याली फिरनी की तड़प साल रही है, गुनगुनी धुप में लिपटी एक अलसाई दोपहर मेरे बदन पे रेंग रही है... डर लगता है, ना जाने किस लम्हा ये डंक मार देगी... ये ख़लिश भी जान्गुसिल है. खयालों का एक सिलसिला सा चल रहा है... यादों के कितने बंजारे आज यहाँ डेरा जमाने वाले हैं: किस्सागोई होगी, सारा दिन नज्मों की खुशबू से महकेगा, जाम टकरायेंगे, शेर पढ़े जायेंगे... और कल सुबह, जब इन तम्बुओं के सिरे खुलेंगे, और ये सब एक नए मुकाम की तलाश में निकल पड़ेंगे, तब मैं यहीं खड़ा रह जाऊंगा- तनहा!
Tuesday, October 11, 2011
बेमायाना हर्फ़
आज जब आंख खुली...
न जाने क्यूँ बिस्तर
किसी वीराने में सोये हुए पत्थर की तरह
सर्द लगा.
एक सफ़ेद शॉल पश्मीने की
जिस्म पे फैली हुयी सी पाई,
और खिड़की के बाहर देखा
किसी दरवेश सा
नाचता हुआ- चाँद.
सब्ज़ मलमल के गलीचे में,
खुद को लिपटा हुआ पाया...
इस टीस, इस तसव्वुर,
इस मदहोशी का नाम सोचता रहा...
तभी कंधे पे,
तुम्हारे नाखूनों से उकेरे हुए,
बेमायाना हर्फ़
बोल पड़े...
न जाने क्यूँ बिस्तर
किसी वीराने में सोये हुए पत्थर की तरह
सर्द लगा.
एक सफ़ेद शॉल पश्मीने की
जिस्म पे फैली हुयी सी पाई,
और खिड़की के बाहर देखा
किसी दरवेश सा
नाचता हुआ- चाँद.
सब्ज़ मलमल के गलीचे में,
खुद को लिपटा हुआ पाया...
इस टीस, इस तसव्वुर,
इस मदहोशी का नाम सोचता रहा...
तभी कंधे पे,
तुम्हारे नाखूनों से उकेरे हुए,
बेमायाना हर्फ़
बोल पड़े...
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