Friday, May 25, 2012

गूँज


रियाज़ में आज उसका दिल नहीं लग रहा था, न मालकौंस की स्वरमाला में वो सुरीलापन रह गया था, न ही वो तड़प... वो क्या गाये? बादल बच्चों की तरह खिडकी पे खड़े आंसू बहा रहे थे, उसने खीझकर कपाट बंद कर दिए, फिर कपड़ों का गट्ठर लेकर बैठ गयी. चुन चुन के कपड़े तहाती रही, तो साथ में गुनगुनाने भी लगी... ‘पग लागन दे’- नहीं, आज सचमुच सुरों में वो बात नहीं- चुप. एक घना सन्नाटा, दीवारों को सराबोर करता, बहते पानी की आवाज़ में गुंथ गया, जैसे माला में फूल. वो यूँ ही बैठी रही, दीवारों को ताकती हुई. चूना गिरने सा लगा था, जिस्मों की रगड़ ने दीवारों का रंग ही बदल दिया था. उसपर पान के धब्बे, अब इसे आने वालों का प्यार कहें या बद्सुलूकी? वैसे भी फर्क कहाँ है इन दोनों में उन लोगों के लिए? कितने घिनौने लगते हैं ये दाग. उसके जिस्म में हिकारत का एक सैलाब सा उठा, तो वो लेट गयी.
दीवार में कहीं कहीं से तो अब ईंट भी झाँकने लगी थी; जैसे अरसा पहले किसीने चुनवा दिया था इसे, किसी मामूली जुर्म के एवज में, और तबसे यहाँ घात लगा के बैठी है, मानो अभी दीवार चीर के कमरे में दाखिल हो जायेगी. छत पे नक्श न जाने क्या क्या चेहरे- सीले हुए चेहरे. इस क़दर बिगड़े हुए की अब उन्हें पहचाना भी न जा सकता था, और फिर उसकी ज़रूरत भी क्या थी? जब तक हाथों में नोट हों, चेहरे देखने की क्या ज़रूरत?
कपास के खेत में चिंगारी की तरह, लेटी रही वो सूती साड़ियों के ढेर पे. फिर न जाने मन में क्या आया कि अलमारी खोल के अपनी बनारसी साड़ियों को निकालने लगी, ब्रोकेड वाली, रंग बिरंगी साड़ियां. एक पीली साड़ी पे नज़र पड़ी तो वो भी खिल उठी- जैसे अमलताश पे बहार आई हो. लिपट सी गयी, जैसे न जाने कबसे इस आलिंगन, इस स्पर्श की कामना में आंसू बहाए हों. उँगलियों से उसके रेशे रेशे को महसूस करती रही, जैसे किसी प्रेमी का शरीर हो. और किसी प्रेमी की ही तरह, वो साड़ी उसके गले, कंधे, कमर तक उलझती रही- सुलगती रही.
आँख खुली तो देखा, उसे- दरवाज़े के पीछे से झांकते हुए, कुछ यूँ कि वो नज़र ही नहीं आ रही थी. सिर्फ उसके पैर. दहलीज़ के उस पार, कसमसाते हुए, शर्माए हुए से. ‘हाय, कैसे रूखे हो गए हैं तुम्हारे पैर’, उसने कहा ‘इधर आओ- मैं तेल लगा दूं ज़रा.’ एक लम्हा असमंजस का, और फिर अधखुला दरवाज़ा कुछ यूँ खटका, कि जैसे अपना गला साफ़ कर रहा हो. एक हल्का सा आलाप लिया, और मुखड़ा दिखा दिया.
उँगलियों से टपकता रहा तेल, उसके पैरों पे... जब तक उसके मटमैले पैर सुनहले न हो गए. उन्हें हाथों में लेकर देखा- मुस्कुराई. ‘तो, चलूँ मैं?’ उसने कहा. दिल जैसे धक् से हो गया. क्या कोई तरीका नहीं? कोई बहाना नहीं? जिससे उसे रोक ले, बांध ले अपनी हथेलियों में, जकड़ ले अपनी उँगलियों से? ‘आलता लगवाएगी?’ ‘लाल-लाल? जैसे डूबता सूरज? ’ ‘हाँ... जैसा उगता हुआ, लगवाएगी?’. और वो फिर बैठ गयी, उँगलियों पे सूरज का रंग देखने की ललक में, जब तक खुद उसके पैर न जलने लगे. इस बार उठी तो कोई प्रलोभन, कोई उपाय काम न आया. वो आवाज़ लगाती रह गयी... पुकारती रह गयी. खड़ी रही थोड़ी देर, उसी तरफ, जिधर उसे देखा था जाते हुए. फिर मुस्कुराकर बैठ गयी, उसके ख्याल, उसकी याद में. उसका चेहरा, उसका स्पर्श, उसकी गंध... फिर मुस्कुराई. सामने वही पीली साड़ी पड़ी थी, जिसपे आलते से रंगे, उसके पैरों के निशाँ थे. उसने साड़ी को समेटा, और थोड़ी देर सीने से लगाया. फिर बड़े करीने से तह करके अलमारी में वापस रख दिया. शाम हो चली थी, बादल थक कर घर जा चुके थे, कमरे के बियाबान में उसकी आवाज़ गूँज उठी- ‘पग लागन दे.’
अंकुश गुप्ता


Wednesday, May 9, 2012

एक लम्हा

मेरी दराज का दरवाज़ा खटखटा रहे हैं,
एक जोड़ी काले झुमके
जो तुमने उतारे थे,
ताकि उसके हाथ
तुम्हारे बालों की झुरमुट के तले
तुम्हारे कानों में कुछ फुसफुसा सकें...

दो छोटी शीशियाँ,
एक खाली, एक अधभरी
साँसों को महकाते अत्र से
जिसकी भीनी भीनी खुशबू
रेंग रही है
बिस्तर पे, दीवारों पे...
बरस रही है, छत से

एक गुलदस्ता,
मेरी मेज़ पे, सोया है
तुम्हारे इंतज़ार में
या उसके,
जिसके हाथों को सहलाया था तुमने,
इसे देने के बहाने

और एक लम्हा,
जिसमें तुम दोनों की आवाज़ एक हो गयी थी,
तुम्हारे जिस्मों की तरह
क़ैद है,
चादर के एक पुलिंदे में...

कहो,
तो उसे खोल कर आज़ाद कर दूं?
ताकि वक़्त आने पे वो फख्र से कह सके...
हाँ उस दिन, जब दुनिया एक दूसरे को मारने पे अमादा थी,
मैंने देखा था उन्हें,
सिर्फ प्यार करते हुए...
उन दो औरतों को!

अंकुश गुप्ता


Wednesday, April 25, 2012

आओ चलें

आओ चलें,
डूबते सूरज की आग से,
रात का लोहा पिघलाना है.
चाँद के पत्थर पे घिसना है,
एक हथियार बनाना है.
ये दरिया सो गया है,
खामोश है...
तूफ़ान जो आना है.

तुम्हारे और मेरे दरमियाँ,
जिस्मों के फासले क्यूँ है?
तुम कहते हो हम एक हैं,
फिर यूँ परे खड़े क्यूँ हैं?
हर रोज़ हमारी खाल पे,
एक रंग लगा देते हैं वो,
हर रोज़ एक नाम देते है,
और पहचान चुरा लेते हैं वो...
आज अब्र से अश्क कुछ यूँ बरसे,
कि धुल जाए जिस्म, तेरा भी- मेरा भी
न रह जाये कोई फासला
घुल जाये जिस्म, तेरा भी- मेरा भी...

क्या नाम है तुम्हारा
कुछ इल्म नहीं, कुछ याद नहीं...
कल ही तो तुम्हे देखा था,
कदम से कदम मिला कर साथ चलते हुए,
और आज कुछ 'अपनों' ने,
तुम्हे बाहर खड़ा छोड़ दिया है,
तनहा!
और अन्दर जश्न मनाने में,
कोई शर्म नहीं समझी.
हमने सोचा था, ये बराबरी कि जंग है,
हक़ की लड़ाई है...
मगर इस छोटे से घर में भी,
एक पूरी दुनिया पराई है,
वाह! कैसी बराबरी? क्या हक़?
कोई सुनवाई नहीं- फ़रियाद नहीं,
अंदर से सुलग रहा है लावा,
कुछ देर और सही,
शहर के शहर ढह जायेंगे...
... सैलाब वो आना है!

आओ चलें,
डूबते सूरज की आग से,
रात का लोहा पिघलाना है.

अंकुश गुप्ता











Friday, April 20, 2012

खोज

आज खोजते रहे हम,
सारा दिन, सारी रात...
तुम्हारे सीने की गर्माहट,
तुम्हारे कंधे, तुम्हारे हाथ.

पत्थर की एक गीली सड़क,
और उसके किनारे भीगते हुए,
मेरे माथे से पानी पोंछने के बहाने,
तुम्हारा मेरे गालों को सहलाना
दो प्याली चाय
तमाम उम्र के किस्से
बिन बात के बिगड़ना,
बात-बात पे बहलाना...

सारा दिन लेटे रहना...
यूँ ही, खामोश,
और फिर शिकायत करना,
'तुम कुछ कहते क्यूँ नहीं?'
यूँ ही लिपटे रहना,
और फिर उलझ जाना...
रात के चाँद से, सुबह के तारे तक,
कोई गुफ्तगू नहीं.

तुम्हारे बाज़ुओं से लिपट जाना
किसी तावीज़ की तरह
और बार-बार उन्हें चूम के,
तुम्हारे नाम का कलमा पढ़ना
तुम्हारे आगोश में बहते रहना
इस शहर के सैलाब में
तुम्हे छू के समझना,
ये सब सच है
तुम्हे थाम के, ख्वाब गढ़ना...

तुम्हारे जिस्म की हर तह, हर रेशा,
हर करवट, हर सिलवट
हर अंगड़ाई, हर मोड़
हर गोशा, हर हरकत,
हर ख़ामोशी, हर बात...
तुम्हारे सीने की गर्माहट,
तुम्हारे कंधे, तुम्हारे हाथ.
आज खोजते रहे हम,
सारा दिन, सारी रात.

Friday, March 2, 2012

जे. एन. यू.

एक रोज़,
पक्की सड़क पे चलते चलते, जब उकता सा गया
तो किसी अजनबी ने एक पगडण्डी दिखाई थी..
और कहा था...
कि यहाँ लोग अपने रास्ते खुद बनाते हैं.

ये वो वक़्त था,
जब सारी रात खाना मिलने पे पाबन्दी नहीं लगी थी...
क्यूंकि हम रात भर सोते ही नहीं थे.
जब वक़्त-बे-वक़्त आने वाले हमारे दोस्तों को,
सिक्यूरिटी वाले 'भैया' से जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती थी,
जब पी. एस. आर. पे लोहे का गेट नहीं लगा था...
जब दो पल की ख़ुशी के दाम नहीं देने पड़ते थे...
जब रात के दो बजे भी...
stadium की घास पे बैठकर,
हम गप्पें मार सकते थे.
शायद लोगों को याद नहीं होगा,
कभी ये जगह आजाद भी हुआ करती थी.

मगर आज आई कार्ड दिखाकर जब अन्दर जाता हूँ...
तो हर रास्ता अजनबी लगता है,
यूँ लगता है, जैसे न जाने किस लम्हे...
ये इमारतें, ये पत्थर, ये ढाबे
मुझे पहचानने से इनकार कर देंगे
और मेरे मैं होने का, सबूत मांगने लगेंगे.
उस दिन,
जब मैं एक कागज़ के टुकड़े से हार जाऊंगा,
तब क्या होगा?

पक्की सड़क पर भागते हुए मेरे कदम...
रुकते हैं किसी टी- पॉइंट पर जाकर,
एक घुप्प सन्नाटा महसूस होता है...
आखिरकार,
जे. एन. यू. सो जो रहा है.

Tuesday, January 31, 2012

याद

आज कल मेरे कमरे में कोई रहता है...

कभी औंधे पड़े जब आँख मेरी खुलती है
मैं उसे देखता हूँ सामने यूँ बैठे हुए
वो मेरे कांधे पे हर रोज़ अपने होठों से
बस कोई शोख़ इबारत सी लिखे जाती है...

और कभी रात भर मैं करवटें बदलता नहीं
यूँ मुझे लगता है वो पास कहीं सोती है
हैं उसके हाथ कहीं लिपटे मेरे सीने से
जैसे वो जिस्म मेरा रात भर सहलाती है...

मेरे हाथों से उसकी खुशबू भी जाती ही नहीं
रोज़ आ जाती है सफ़री, शरार-ए-सहरी सी
हरेक गोशे को मेरे जाने किस तवस्सुल से
नगहत-ए-गुल, नमूद-ए-शबनम तक महकाती है...

ये भी देखा है हमने बारहा बेखुद होके
जैसे कि ये विसाल बस कोई सुराब नहीं
आलम-ए-इज़्तराब, सेहरा-ए-मुहब्बत में
जब भी जाता हूँ उसकी याद चली आती है...

Thursday, January 19, 2012

untitled 2

नीली रोशनी में नहाये बदन,
क्या-क्या दास्तानें सुनाएं बदन.

महकी ख्वाहिशों का
एक लिबास है, उजास है;
जो उँगलियों के पोर से
फिसल-फिसल के पुतलियों
की सीप में बरस रही
हैं चूम कर,
मचल रहे दो लब कहीं.

है एड़ियों पे फिर रहा
वो रेशमी सी रात का
कोई सिरा, जो खुल गया
की बेखबर जो चाँद था
वो आसमान की नाव में
है डोलता मचल-मचल
बरस रहा पिघल-पिघल
वो खिड़कियों के रास्ते
यूँ तैरता है हर तरफ
कि हाथ बस बढ़ा सा लें
तो ओढ़ लें ये दो बदन...

ये दो बदन
जो एक हैं.