एक रोज़,
पक्की सड़क पे चलते चलते, जब उकता सा गया
तो किसी अजनबी ने एक पगडण्डी दिखाई थी..
और कहा था...
कि यहाँ लोग अपने रास्ते खुद बनाते हैं.
ये वो वक़्त था,
जब सारी रात खाना मिलने पे पाबन्दी नहीं लगी थी...
क्यूंकि हम रात भर सोते ही नहीं थे.
जब वक़्त-बे-वक़्त आने वाले हमारे दोस्तों को,
सिक्यूरिटी वाले 'भैया' से जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती थी,
जब पी. एस. आर. पे लोहे का गेट नहीं लगा था...
जब दो पल की ख़ुशी के दाम नहीं देने पड़ते थे...
जब रात के दो बजे भी...
stadium की घास पे बैठकर,
हम गप्पें मार सकते थे.
शायद लोगों को याद नहीं होगा,
कभी ये जगह आजाद भी हुआ करती थी.
मगर आज आई कार्ड दिखाकर जब अन्दर जाता हूँ...
तो हर रास्ता अजनबी लगता है,
यूँ लगता है, जैसे न जाने किस लम्हे...
ये इमारतें, ये पत्थर, ये ढाबे
मुझे पहचानने से इनकार कर देंगे
और मेरे मैं होने का, सबूत मांगने लगेंगे.
उस दिन,
जब मैं एक कागज़ के टुकड़े से हार जाऊंगा,
तब क्या होगा?
पक्की सड़क पर भागते हुए मेरे कदम...
रुकते हैं किसी टी- पॉइंट पर जाकर,
एक घुप्प सन्नाटा महसूस होता है...
आखिरकार,
जे. एन. यू. सो जो रहा है.
Friday, March 2, 2012
Tuesday, January 31, 2012
याद
आज कल मेरे कमरे में कोई रहता है...
कभी औंधे पड़े जब आँख मेरी खुलती है
मैं उसे देखता हूँ सामने यूँ बैठे हुए
वो मेरे कांधे पे हर रोज़ अपने होठों से
बस कोई शोख़ इबारत सी लिखे जाती है...
और कभी रात भर मैं करवटें बदलता नहीं
यूँ मुझे लगता है वो पास कहीं सोती है
हैं उसके हाथ कहीं लिपटे मेरे सीने से
जैसे वो जिस्म मेरा रात भर सहलाती है...
मेरे हाथों से उसकी खुशबू भी जाती ही नहीं
रोज़ आ जाती है सफ़री, शरार-ए-सहरी सी
हरेक गोशे को मेरे जाने किस तवस्सुल से
नगहत-ए-गुल, नमूद-ए-शबनम तक महकाती है...
ये भी देखा है हमने बारहा बेखुद होके
जैसे कि ये विसाल बस कोई सुराब नहीं
आलम-ए-इज़्तराब, सेहरा-ए-मुहब्बत में
जब भी जाता हूँ उसकी याद चली आती है...
कभी औंधे पड़े जब आँख मेरी खुलती है
मैं उसे देखता हूँ सामने यूँ बैठे हुए
वो मेरे कांधे पे हर रोज़ अपने होठों से
बस कोई शोख़ इबारत सी लिखे जाती है...
और कभी रात भर मैं करवटें बदलता नहीं
यूँ मुझे लगता है वो पास कहीं सोती है
हैं उसके हाथ कहीं लिपटे मेरे सीने से
जैसे वो जिस्म मेरा रात भर सहलाती है...
मेरे हाथों से उसकी खुशबू भी जाती ही नहीं
रोज़ आ जाती है सफ़री, शरार-ए-सहरी सी
हरेक गोशे को मेरे जाने किस तवस्सुल से
नगहत-ए-गुल, नमूद-ए-शबनम तक महकाती है...
ये भी देखा है हमने बारहा बेखुद होके
जैसे कि ये विसाल बस कोई सुराब नहीं
आलम-ए-इज़्तराब, सेहरा-ए-मुहब्बत में
जब भी जाता हूँ उसकी याद चली आती है...
Thursday, January 19, 2012
untitled 2
नीली रोशनी में नहाये बदन,
क्या-क्या दास्तानें सुनाएं बदन.
महकी ख्वाहिशों का
एक लिबास है, उजास है;
जो उँगलियों के पोर से
फिसल-फिसल के पुतलियों
की सीप में बरस रही
हैं चूम कर,
मचल रहे दो लब कहीं.
है एड़ियों पे फिर रहा
वो रेशमी सी रात का
कोई सिरा, जो खुल गया
की बेखबर जो चाँद था
वो आसमान की नाव में
है डोलता मचल-मचल
बरस रहा पिघल-पिघल
वो खिड़कियों के रास्ते
यूँ तैरता है हर तरफ
कि हाथ बस बढ़ा सा लें
तो ओढ़ लें ये दो बदन...
ये दो बदन
जो एक हैं.
क्या-क्या दास्तानें सुनाएं बदन.
महकी ख्वाहिशों का
एक लिबास है, उजास है;
जो उँगलियों के पोर से
फिसल-फिसल के पुतलियों
की सीप में बरस रही
हैं चूम कर,
मचल रहे दो लब कहीं.
है एड़ियों पे फिर रहा
वो रेशमी सी रात का
कोई सिरा, जो खुल गया
की बेखबर जो चाँद था
वो आसमान की नाव में
है डोलता मचल-मचल
बरस रहा पिघल-पिघल
वो खिड़कियों के रास्ते
यूँ तैरता है हर तरफ
कि हाथ बस बढ़ा सा लें
तो ओढ़ लें ये दो बदन...
ये दो बदन
जो एक हैं.
Monday, November 7, 2011
khat
ना जाने मैं ये ख़त तुम्हे क्यूँ लिख रहा हूँ... ना जाने वो कौन सी बात है, जो मेरे लब तुम्हारे कानों में फुसफुसा नहीं सकते. मेरे रुंधे से गले में अटकी सी हुई एक चीख... शायद तुम्हारे शानों की सरमायेदारी की मोहताज है... ना जाने कब वो मौसम मेहेरबान होगा... ना जाने कब सावन जायेगा... ना जाने कब आँखों के आइने में तुम झांकोगे... ना जाने कब मैं फिर से खो जाऊंगा, ना जाने तुम कब मिलोगे? इस जुबां में तुम्हारी तंगहाली का इल्म होते हए भी, तुम्हे इसीमें ख़त लिख रहा हूँ... इस जुर्म की जो भी सजा मुनासिब लगे, दे देना.
आज ना जाने क्यूँ, पुरानी दिल्ली के गुम्बद आँखों के सामने तैर रहे हैं... एक प्याली फिरनी की तड़प साल रही है, गुनगुनी धुप में लिपटी एक अलसाई दोपहर मेरे बदन पे रेंग रही है... डर लगता है, ना जाने किस लम्हा ये डंक मार देगी... ये ख़लिश भी जान्गुसिल है. खयालों का एक सिलसिला सा चल रहा है... यादों के कितने बंजारे आज यहाँ डेरा जमाने वाले हैं: किस्सागोई होगी, सारा दिन नज्मों की खुशबू से महकेगा, जाम टकरायेंगे, शेर पढ़े जायेंगे... और कल सुबह, जब इन तम्बुओं के सिरे खुलेंगे, और ये सब एक नए मुकाम की तलाश में निकल पड़ेंगे, तब मैं यहीं खड़ा रह जाऊंगा- तनहा!
आज ना जाने क्यूँ, पुरानी दिल्ली के गुम्बद आँखों के सामने तैर रहे हैं... एक प्याली फिरनी की तड़प साल रही है, गुनगुनी धुप में लिपटी एक अलसाई दोपहर मेरे बदन पे रेंग रही है... डर लगता है, ना जाने किस लम्हा ये डंक मार देगी... ये ख़लिश भी जान्गुसिल है. खयालों का एक सिलसिला सा चल रहा है... यादों के कितने बंजारे आज यहाँ डेरा जमाने वाले हैं: किस्सागोई होगी, सारा दिन नज्मों की खुशबू से महकेगा, जाम टकरायेंगे, शेर पढ़े जायेंगे... और कल सुबह, जब इन तम्बुओं के सिरे खुलेंगे, और ये सब एक नए मुकाम की तलाश में निकल पड़ेंगे, तब मैं यहीं खड़ा रह जाऊंगा- तनहा!
Tuesday, October 11, 2011
बेमायाना हर्फ़
आज जब आंख खुली...
न जाने क्यूँ बिस्तर
किसी वीराने में सोये हुए पत्थर की तरह
सर्द लगा.
एक सफ़ेद शॉल पश्मीने की
जिस्म पे फैली हुयी सी पाई,
और खिड़की के बाहर देखा
किसी दरवेश सा
नाचता हुआ- चाँद.
सब्ज़ मलमल के गलीचे में,
खुद को लिपटा हुआ पाया...
इस टीस, इस तसव्वुर,
इस मदहोशी का नाम सोचता रहा...
तभी कंधे पे,
तुम्हारे नाखूनों से उकेरे हुए,
बेमायाना हर्फ़
बोल पड़े...
न जाने क्यूँ बिस्तर
किसी वीराने में सोये हुए पत्थर की तरह
सर्द लगा.
एक सफ़ेद शॉल पश्मीने की
जिस्म पे फैली हुयी सी पाई,
और खिड़की के बाहर देखा
किसी दरवेश सा
नाचता हुआ- चाँद.
सब्ज़ मलमल के गलीचे में,
खुद को लिपटा हुआ पाया...
इस टीस, इस तसव्वुर,
इस मदहोशी का नाम सोचता रहा...
तभी कंधे पे,
तुम्हारे नाखूनों से उकेरे हुए,
बेमायाना हर्फ़
बोल पड़े...
Monday, October 3, 2011
Time Capsule
रात के साहिल पे बैठे...
न जाने किस नादानी में,
दो सिक्के उछाले थे
वक़्त के ठहरे पानी में...
क्या मालूम था,
सेहर होने तक,
उसके दायरे हमें
अपनी गिरफ़्त में ले लेंगे...
फुसफुसाती हुई हवा से
बातें तो की थीं
आस्मां में सितारों को
बहते हुए भी देखा था...
कोहरें के महीन धागों से,
एक पैरहन भी बुना था
मगर सुबह पाया...
कि फखत हमारी उंगलियाँ ही थीं...
जो उलझ के रह गयीं थीं
कितना फासला होता है
होने/ न होने के दरमियाँ?
एक धुन पे तैरती,
धुएं की लकीर से पूछो...
जिसके आगोश में सहेजकर,
एक लम्हा बहा दिया था हमने
वक़्त के दरिया में,
कि किसी रात
इसी साहिल पे बैठे हुए
दो अजनबी
अचानक ही कुछ गुनगुनायेंगे...
शायद... यही धुन...
TRANSLATION-
sitting on the shore of the night,
we tossed two coins
in the still water of time
not knowing,
that by dawn,
its ripples will engulf us...
we chatted with the rustling winds
saw the floating stars in the sky
and knit a shawl from the thin threads of fog
only to discover,
that it were our fingers,
intertwined.
whats the distance
between being/ not being?
ask a thread of smoke,
that floats on a tune
which, we sailed
in the ocean of time
with a moment carefully kept within...
so that some night,
sitting on this shore
two strangers
would suddenly hum something...
perhaps... the same tune...
न जाने किस नादानी में,
दो सिक्के उछाले थे
वक़्त के ठहरे पानी में...
क्या मालूम था,
सेहर होने तक,
उसके दायरे हमें
अपनी गिरफ़्त में ले लेंगे...
फुसफुसाती हुई हवा से
बातें तो की थीं
आस्मां में सितारों को
बहते हुए भी देखा था...
कोहरें के महीन धागों से,
एक पैरहन भी बुना था
मगर सुबह पाया...
कि फखत हमारी उंगलियाँ ही थीं...
जो उलझ के रह गयीं थीं
कितना फासला होता है
होने/ न होने के दरमियाँ?
एक धुन पे तैरती,
धुएं की लकीर से पूछो...
जिसके आगोश में सहेजकर,
एक लम्हा बहा दिया था हमने
वक़्त के दरिया में,
कि किसी रात
इसी साहिल पे बैठे हुए
दो अजनबी
अचानक ही कुछ गुनगुनायेंगे...
शायद... यही धुन...
TRANSLATION-
sitting on the shore of the night,
we tossed two coins
in the still water of time
not knowing,
that by dawn,
its ripples will engulf us...
we chatted with the rustling winds
saw the floating stars in the sky
and knit a shawl from the thin threads of fog
only to discover,
that it were our fingers,
intertwined.
whats the distance
between being/ not being?
ask a thread of smoke,
that floats on a tune
which, we sailed
in the ocean of time
with a moment carefully kept within...
so that some night,
sitting on this shore
two strangers
would suddenly hum something...
perhaps... the same tune...
अर्ज़ी
क्या चाहिए?- उसने कहा
सच ही तो है, क्या चाहिए मुझे?
दालान की काई को पैर से कुरेदते हुए,
खड़ा रहा...
यूँ लगा, सूरज मेरे सर से गुज़रकर,
पैरों तले बैठ गया है.
न जाने कितनी देर वहाँ खड़ा पिघलता रहा...
फिर हथेली में छुपाया हुआ कागज़ का एक टुकड़ा
उसकी जानेब बढ़ाते हुए
शायद पहली बार उसकी आँखों में देखा...
कागज़ की सिलवटों के साहिल पे
तैरती हुई स्याही में लिखी एक रुबाई,
जो न जाने कितनी बार दिल में दोहराई थी
मेरे कानों में पिघलते शरारे की तरह गिरी...
और मेरे हवास को बहा ले गयी...
होश आया,
तो उस ड्योढ़ी पे लिपटी हुई किसी बेल की तरह
खुद को खड़ा पाया...
क्या चाहिए? -उसने फिर पूछा
और क्या चाहिए था मुझे, इन चंद लम्हों के सिवा?
मुस्कुराकर कहा...
अब... कुछ नहीं.
सच ही तो है, क्या चाहिए मुझे?
दालान की काई को पैर से कुरेदते हुए,
खड़ा रहा...
यूँ लगा, सूरज मेरे सर से गुज़रकर,
पैरों तले बैठ गया है.
न जाने कितनी देर वहाँ खड़ा पिघलता रहा...
फिर हथेली में छुपाया हुआ कागज़ का एक टुकड़ा
उसकी जानेब बढ़ाते हुए
शायद पहली बार उसकी आँखों में देखा...
कागज़ की सिलवटों के साहिल पे
तैरती हुई स्याही में लिखी एक रुबाई,
जो न जाने कितनी बार दिल में दोहराई थी
मेरे कानों में पिघलते शरारे की तरह गिरी...
और मेरे हवास को बहा ले गयी...
होश आया,
तो उस ड्योढ़ी पे लिपटी हुई किसी बेल की तरह
खुद को खड़ा पाया...
क्या चाहिए? -उसने फिर पूछा
और क्या चाहिए था मुझे, इन चंद लम्हों के सिवा?
मुस्कुराकर कहा...
अब... कुछ नहीं.
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